तथागत गौतम बुद्ध
महामानव बुद्ध का जन्म 563 ई. पूर्व कपिलवस्तु नरेश महाराजा शुद्धोधन एवं माता महामाया की कोख से कपिल वस्तु में हुआ था। उनके जन्म के सातवें दिन उनकी माता महामाया का परिनिर्वाण हो गया था। इनका लालन पालन इनकी मौसी प्रजापति गौतमी ने किया। उनके बचपन का नाम सिद्धार्थ रखा गया था। उनके जन्म के समय आर्य आकर उत्तर भारत में स्थापित हो चुके थे। वे यहां के निवासी होने के साथ-साथ सुसंस्कृत भी हो चुके थे। उस समय 'हिन्दू' शब्द चला ही नहीं था किन्तु उन्होंने जाति प्रथा कामय कर दी थी जो कर्म पर आधारित थी। राजकुमार गौतम का भी राजर्षि ढंग से पालन किया गया। बड़े व व्यस्क होने पर उन्होंने सामाजिक बुराइयों, कुरीतियों को बहुत निकट से देखा। मानव अपने स्वार्थ के कारण दूसरे मनुष्यों का शोषण ही नहीं कर रहा था बल्कि प्राणि हिंसा भी कर रहा था। समयानुसार 16 वर्ष की आयु में उनका विवाह कोली वंशीय यशोधरा के साथ धूमधाम से कर दिया गया। 29 वर्ष की आयु में यशोधरा को एक पुत्र जन्मा जिसका नाम राहुल रखा गया
राजकुमार गौतम अब जीवन एवं समाज की सच्चाई जान चुके थे उनहे विलासिता पूर्ण जीवन एवं सामाजिक व्यवस्था से विरक्ति होने लगी। इसी समय एक घटना घटी। शाक्यों एवं कोलियों में रोहिणी नदी के जल के उपयोग को लेकर मतभेद हो गया। शाक्यों ने बैठक कर कोलियों के ऊपर हमला करने का निर्णय लिया जिसका सिद्धार्थ गौतम ने विरोध किया उनके समक्ष विकल्प रखे गये कि या तो वे संघ के निर्णय पर सहमत हों अथवा गृह त्याग कर दे। राजकुमार ने मानव कल्याण के लिए दूसरे विकल्प को चुना क्यों कि राजकुमार गौतम सभी समस्याओं का समाधान बिना युद्ध किये चाहते थे। इस प्रकार
राजकुमार सिद्धार्थ गौतम गृह त्याग कर सत्य की खोज में निकल गये। सर्वप्रथम वे मगध राज्य की राजधानी राजगृह पहुंचे। वहां पर उनका सम्पर्क कोडिन्य, भद्धिय, बप्पा, महानाम व अस्सजि सन्यासियो से हुआ जो पूर्व से ही सत्य की खोज में लगे थे। इन सभी ने पहले अलार कलाम एवं तदोपरान्त उद्दक रामपुत्त को अपना गुरू बनाया एवं उनसे ध्यान योग की शिक्षा गृहण की किन्तु ये सन्यासी भी मनुष्यों के दुख से मुक्ति का मार्ग नहीं बता सके और वे उनसे विदा लेकर उरवेला (अब निरंजना) पहुंचे।
उरवेला में एक सुन्दर नदी, शान्तिदायक जंगल तथा पास में ही एक गांव था। साधना एवं ध्यान योग हेतु यह स्थान उपयुक्त था। उस समय ध्यानयोग की कायाकष्ट विधि प्रचलित थी। पहले उन्होंने एक दिन में एक बार फिर दो दिन में एक बार तथा फिर तीन दिन में एक बार भोजन किया। उसके बाद भिक्षा लेना ही बन्द कर दिया। वे कंदमूल, फल पत्तियों पर ही जीवन निर्वाह करने लगे। परिणामस्वरूप । इनके शरीर में बहुत दुर्बलता आ गई. हड्डियां बाहर निकल आई, त्वचा मुरझा गई, आंखे गड़ गई, शरीर में दर्द एवं भूख की पीड़ा उन्हें सताने लगी। देर तक श्वास रोकने पर सिर चकराने लगा। दिन में तपती धूप में तथा रात को बन्द कोठरी में रहने से घुटन होती, जाड़ों में बर्फीले ठण्डे पानी से स्नान करते, कूड़े पर पड़े चिथड़ों से शरीर ढकते, श्मशान में अकेले रहते। इतना सब करने के उपरान्त भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त नहीं हुए।
फिर एक दिन सिद्धार्थ गौतम बेहोश हो गये, इस स्थिति में वे एक गडरिये को मिले, उसने अपने घर ले जाकर दूध पिलाया और उनके स्वास्थ्य की देखभाल की। कुछ दिन बाद उनका स्वास्थ्य ठीक हो गया। ठीक होने पर वे अपने पांचों साथियों से मिलने गये। सिद्धार्थ को स्वस्थ अवस्था में देख उन्हें बहुत बुरा लगा। इससे वे इतने क्षुब्ध हुए कि सिद्धार्थ को अकेला छोड़कर चले गये। उसके बाद सिद्धार्थ ने अपने स्वास्थ्य पर भी ध्यान दिया, उनके त्वचा की आभा वापिस आ गई। वहां के धनाढ्य सेठ की कन्या सुजाता ने मनोकामना की थी कि पुत्र की प्राप्ति पर वह गांव के बरगद देवता को खीर चढ़ायेगी। जब वह वहां से गुजर रही थी तो बरगद पेड़ के नीचे सिद्धार्थ को बैठा पाकर सुजाता समझी कि आज बरगद देवता प्रकट हो गये है। वह जल्दी-जल्दी खीर बनाकर सोने के मूल्यवान कटोरे में भरकर कटोरा सहित सिद्धार्थ को अर्पित की गई तथा ग्रहण करने की प्रार्थना की। खीर का कटोरा लेकर सिद्धार्थ निरंजना नदी गये वहां स्नान कर बुद्धत्व प्राप्ति के पूर्व का अन्तिम भोजन सुजाता की खीर के रूप में ग्रहण किया। भोजन कर हाथ धोने के बाद कटोरे को निरंजना नदी में तैराते हुए कहा- "यदि मुझे आज सम्बोधि की प्राप्ति होनी है तो यह कटोरा नदी में विपरीत दिशा को बहे"- कटोरा विपरीत दिशा को बहा गौतम ने पास के ही जंगल में विश्राम किया और संध्या समय बोधि वृक्ष की ओर चले, वहां पर श्रोत्रिय नाम के घसियारे ने बोधीवृक्ष के नीचे कुश का आसन लगाया जिस पर गौतम ध्यान में बैठ गये। वैशाख की पूर्णिमा को उन्हें बुद्धत्व की प्राप्ति हुई।
ध्यान शुरू करने पर उनके ध्यान में पहले प्रेत आये, जिन्होंने डराने की बहुत चेष्टा की, फिर वे अनेक मानसिक संवेदनाओं से गुजरे, सारे पूर्व जन्म याद आये, किस प्रकार वस्तुएं रूप लेती है और किस प्रकार नष्ट हो जाती है पर विचार किया। उनका मस्तिष्क पवित्र हो गया था। वेदनायें कैसे आती है और कैसे उन्हें नष्ट किया जा सकता हे, यह जाना। कामेच्छा की वेदना, अमरत्व की इच्छा भ्रम तथा अनेक वेदनाओं को नष्ट कर मुक्ति प्राप्त की। उन्होंने लोगों को बताया कि अब मैं आवागमन से मुक्त हो गया हूँ। सात दिन के ध्यान के बाद सूर्य उदय के साथ जब बैसाख पूर्णिमा समाप्ति पर थी, उनका ध्यान टूटा। ध्यान टूटने पर उन्होंने बोधी वृक्ष को कृतज्ञता पूर्वक देखा जिसने ध्यान के दौरान उनहें छाया प्रदान की। वहां पर उपस्थित तपस्स व भल्लुक व्यापारियों को सर्वप्रथम भगवान बुद्ध ने अपना अनुभव सुनाया। इन दोनों ने शिष्यत्व ग्रहण कर पहले बौद्ध गृहस्थ धर्मानुयायी होने का गौरव प्राप्त किया। इस समय भगवान बुद्ध की आयु 35 वर्ष थी।
वे ऐसे व्यक्ति की खोज में निकले जो शीघ्रता से उनके ज्ञान को समझ सके। वे अपने गुरू अलार-कलाम व उद्दक रामपुत्त की खोज में गये। पता चला कि वे मृत्यु को प्राप्त हो चुके है। तब उन्हें पांच साथियों की याद आयी जो नाराजगी में उन्हें छोड़कर सारनाथ चले आये थे। भगवान बुद्ध जब उनके पास सारनाथ पहुंचे तो उन्होंने सम्बोधि प्राप्ति की अनुभूतियों को तुरन्त समझ लिया। उस सन्ध्या को उन्होंने पंच भिक्षुओं को पहला प्रवचन किया जिसे "धर्मचक्र प्रवर्तन" नाम दिया गया। उसके बाद उन्होंने प्रतिदिन प्रवचन किया। जीवन के अन्तिम 45 वर्षों तक भगवान बुद्ध ने सत्य पर आधारित अपने दर्शन का प्रसार किया।
बुद्ध के दर्शन की आधारशिला 4 आर्य सत्य 1. जीवन में दुख है (बुढ़ापा, बीमारी, असंतोष, मृत्यु का भय घेरे रहता
2. दुख का कारण है (तृष्णा- - इच्छाओं का बलवान होना)
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